Saturday, 31 March 2012

सेलुलर जेल


सेलुलर जेल !
तुम इसलिए राष्ट्रीय स्मारक हो
कि नई पीढ़ी जान सके
तुम्हारी साढ़े चार मीटर लंबी और तीन मीटर चौड़ी
दड़बेनुमा 698 कोठरियों की दीवारों में
आज़ादी के अनेक दीवानों ने
किस तरह बिताई यातनामय ज़िन्दगी
अंडमान निकोबार की धरती का जल ‘काला पानी’ क्यों कहलाया?
उन्हें मिल सके इस सवाल का जवाब।

सेलुलर जेल!
तुम्हें इसलिए सुरक्षित रखा गया है
कि बीते कल के इतिहास से सनी तुम्हारी दीवारों में
प्रांगण और कोठरियों के धरातल पर
गुलामी के विरुद्ध बगावत का बिगुल बजाने वालों के जज़्बे
और घुटन की गंध को सूंघा जा सके
दफ़्न हो गए स्वतंत्रता सेनानियों के
हवा में खो गए सपनों को महसूस किया जा सके।

सेलुलर जेल!
तुम हमारे लिए इसलिए राष्ट्रीय धरोहर हो
कि तुम्हारे भवन की योजना को देख-पढ़ कर
हम अंग्रेज़ों की कुत्सित मानसिकता
उनके घिनौने शासन-तंत्र
और देश के गद्दारों की फेहरिस्त को पढ़ सकें।

Friday, 30 March 2012

ज़िन्दगी और उसके फ़लसफ़े


कल अचानक आंधियों के गांव में जाना हुआ
दीप हर घर में जला देखा तो मैं हैरां हुआ
नहीं था आंधियों के घर हवा का वेग
रसरंगमय वातावरण सुरभित
निर्द्वंद्व थी हर दीप की बाती
उल्लास था--
गांव के हर द्वार आंगन में
अठखेलियों में मगन था बचपन
हर चेहरे पर दमकता था दरपन
लाड़-प्यार और विनोद-चुहल की चहक थी
यौवन की गुनगुन और रुनझुन की महक थी
हतप्रभ खड़ा मैं सोचने लगा--
क्यों नहीं दिखता यहां जीवन का संघर्ष
खीज, बौखलाहट और समय से दुर्घर्ष
पसीने की चिपचिपाहट
देह की थकन
भूख की बिलबिलाहट
पेट की जलन
पैरों की बिंवाई, हाथों की ठेक
देह की खुरसट में लहू की रेख
होंठों की पपड़ी पर तड़पती प्यास
डूबती आंखों में जीवन की आस
लू की जलन में छाया का सुख
टप-टप छत और अभावों का दुख
भूख से व्याकुल ममता का त्याग
चीख और चिल्लाहट, आंसुओं का राग।

तभी एक महात्मा ने
कंधे पर हाथ रखकर पूछा :
वत्स, क्या देखते हो?
क्यों हो दुखी और क्या सोचते हो?
मैंने कहा, महात्मन!
आहत हूं, समाज के वर्ग भेद से
छुआछूत, जातपांत, ऊंच-नीच से
एक ओर सुविधाओं का अंबार है
दूसरी ओर आंसुओं की भरमार है
मैं खड़ा-खड़ा
इस सम्पन्न समाज को निहार रहा हूं
वर्गभेद के कारण और निवारण पर विचार रहा हूं
मैं देख रहा हूं कमेरों और लुटेरों की दुनिया का फ़र्क
किस सफाई से रचा है यह स्वर्ग और नर्क
कमेरे मेहनत से करते हैं उत्पादन
बनिकों का गणित करता, उसका निष्पादन
कैसा यह व्याकरण, कैसा यह जादू
कमेरे की कुंडली में जम जाता राहू
कमेरा रह जाता है नंगे का नंगा
नहीं लेता बेचारा किसी से भी पंगा
उसकी तो थाती है केवल उच्छवास
कल होगा अपना--यह हौसला-विश्वास
सदियों से डगर यह चली आ रही है
नहीं लीक मिटती नज़र आ रही है
आप ही बताएं महात्मन
ये अन्याय क्यों है?
जो करे अन्न पैदा वही भूखा क्यों है?

महात्मा मुस्कराए धीरे से बोले--
शांत बेटे शांत!
मत करो मन को बिलकुल भी क्लांत
विधि का विधान सब
है कर्मों का लेखा
मत ना करो तुम तनिक भी परेखा
सुनो मैं कहानी सुनाता हूं तुमको
गुन सको तो गुनना, बताता हूं तुमको
थे दो गरीब किस्मत के मारे
दर-दर भटकते थे दोनों बेचारे
न मिली चाकरी न मिला कोई धंधा
उन्हें घूरता शक से हर कोई बंदा
सोना भी हो जाता था उनके हाथों में मिट्टी
किस्मत की उनसे ऐसी थी कुट्टी
जर्जर वसन चाम उनके थे सूखे
अधपेट बेचारे रहते थे भूखे
जूते न चप्पल सदा पैर नंगे
दुतकारे जाते थे वे भीखमंगे
उनमें से एक ने
एक दिन बिचारा
कर्म से यह जीवन
क्यों न जाए सुधारा!
लिखी अपने हिस्से में जो तन पर लंगोटी
नहीं भाग्य में है जो भरपेट रोटी
कंटकों पर ही चलना है जब किस्मत में अपने
तो देखें ही क्यों हम असंभव से सपने
सुलभ जो भी हो जाए प्रभु की कृपा से
उसे हर्ष से हम
लगावेंगे माथे।

उस रंक ने यूं मनन करके गहरा
कहा सब जनों से--हटा धुंध गहरा
क्षमा से बड़ा सुख न दुनिया में कोई
क्षमा ही दिलाए, चित्त की शांति खोई
दया कीजिए निर्बलों, निर्धनों पर
दया कीजिए मूक जीव-जन्तुओं पर
क्रोध करके कलुष अपने मन को न कीजे
क्रोध के ताप में होम शांति न कीजे
लालच बुरी है बला मेरे भाई
पापों की गठरी है इसमें समाई
व्यापार का सिर्फ यह फलसफा हो
आटे में नमक की तरह बस नफा हो
कमाई का एक हिस्सा करो दान भाई
पुण्य से ही होगी खुद की भलाई
भूखा न लौटे, कोई द्वारे पर आकर
गिरे को उठाओ ममता दिखाकर
पीर दूजे की हरने में जो मन लगाए
संत और महात्मा वह शख्स कहाए।

बेटे!
लोगों को भा गई उस रंक की हर बात
जो रहता था मगन ईश-भक्ति के साथ
मुनी का दिया दर्जा लोगों ने उसको
जो कल तक था व्याकुल, तृष्णा थी जिसको
कर्म से उस रंक ने अपनी दुनिया संवारी
गुमनाम था जो हुआ अब हजारी
इशारे पर उसके धन-धान्य बटते
कदमों में मुद्राओं के अंबार लगते
किन्तु भाग्य में था अधपेट रहना
बिन वसन नंगे पैरों ही चलना
वह सिलसिला तो तनिक भी न बदला
किन्तु कर्मों से उसने पद अपना बदला
भूख-प्यास को उसने नियमों में बांधा
पादुका बिन यात्रा से खुद को है साधा
कठिन साधना से कर सरल अपने मन को
शांति का संदेश दिया जन-जन को
उसको मिली जग में गुरु पद की सत्ता
दिनों दिन बढ़ी उसकी जग में महत्ता।

बेटे!
मिलेगा वही, जो लिखा भाग्य में है
इस कहानी से चाहो तो तुम खुद को मथ लो
कर्म से निज जीवन चाहो तो बदलो।

किन्तु सांसारिक ज्ञान है यह मुझसे कहता
क्यों व्यर्थ की भावनाओं में तू बहता
भय है घुसा हर आदमी के भीतर
भय ने ही गढ़ा है यह काल्पनिक ईश्वर
आदमी ने ही रचे हैं ये सामाजिक विधान
उसने ही ताने हैं ऊंच-नीच के वितान
प्रकृति की संपदा है सबके लिए
जिसका जीवन है जितना वो तब तक जिए
है शाश्वत विधान
कि ताकतवर ही करता है कमजोर का शिकार
कमजोर के वश में है बस चीख-पुकार
इसलिए ताकतवर बनो
दुनिया को ताकत से हनो।

फ़लसफ़े ज़िन्दगी के बिखरे पड़े हैं
सलमे-सितारे सभी में जड़े हैं
कोई  फ़लसफ़ा कहता--ताकत की दुनिया
कोई कहता--गुनिया की है सिर्फ दुनिया
प्रकृति का करिश्मा जताता है कोई
किस्मत का लिक्खा बताता है कोई
मगर मेरी बुद्धि में कुछ न समाए
किसे सत्य मानूं समझ में न आए।

Thursday, 29 March 2012

पुलिस


महाकवि तुलसीदास ने
रामचरित मानस की रचना से पहले
दुष्टों का स्मरण कर उनकी अभ्यर्थना की थी
कि वे अपनी दुष्टता की छाया से उन्हें बचाए रखें
मेरा भी मानना है इसी तरह हर सभ्य नागरिक को
सामाजिक जीवन में कदम रखते ही
पुलिस की अभ्यर्थना करनी चाहिए
कि वह उसके सम्मान को कोई ठेस न पहुंचाए
ईश्वर से प्राथना करनी चाहिए
कि वह पुलिस की छाया से भी उसे दूर रखे
विद्वानों का तर्क है :
बिना पुलिस समाज में कानून व्यवस्था चौपट हो जाएगी
लेकिन मेरे कड़वे तजुर्बे का तर्जुमा है :
पुलिस ही करती है कानून व्यवस्था को चौपट
सच मानिए, पुलिस के नाम से भूत भी भागते हैं
कानून और आदमी की तो बिसात ही क्या
पुलिस दिन को रात कर सकती है और रात को दिन
सूरज को चांद में बदल सकती है
और चांद को कर सकती है गायब।

जिस अपराधी ने पुलिस से सांठगांठ कर ली
समझो मौज हो गई उसकी जीवन में
वह दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की करता जाएगा
और शर्तों की उल्लंघना से बाहर जाते ही बेमौत मारा जाएगा
किन्तु कोई सभ्य नागरिक पुलिस से  दोस्ती कर लेता है
तो समझो वह अपने जीवन में नरक भर लेता है
चूंकि पुलिस की दोस्ती भी उतनी ही खराब है जितनी दुश्मनी
पुलिस ने आपकी देहरी के अंदर झांक लिया
तो समझो आपको आंक लिया
तब कलह आपकी जीवन संगिनी हो जाएगी
ज़िन्दगी, दुष्ट प्रेमी पुलिस की बंदिनी हो जाएगी।

पुलिस उस शह का नाम है
जिसके एक हाथ में है मात और दूसरे में मौत
शर्मदार तो पुलिस का साया पड़ते ही आधा मर जाता है
मेरा मानना है पुलिस ही बनाती है आदमी को
चोर, बदमाश, स्मगलर, डॉन, माफिया
इसीलिए कहता हूं
शरीफ आदमी को पुलिस से आंख नहीं मिलानी चाहिए
पुलिस से आंख मिलते ही
शरीफ आदमी शरीफ नहीं रहता
चौकी-थाने में उसकी डायरी खुल जाती है
कुल जाति लिख जाती है
और कुंडली में शनि की साढ़ेसाती शुरू हो जाती है
फिर परिवार की आय परिवार नहीं, पुलिस खाती है।

पुलिस रक्षक है :
उनके लिए जो अपनी रक्षा खुद करना जानते हैं
पुलिस भक्षक है :
उनके लिए जो अवैध धंधा करते हैं और नहीं देते पुलिस को हिस्सा
पुलिस तक्षक है :
उनके लिए जो न वैध धंधा करते हैं न अवैध पर चाहते हैं सुरक्षा
कोई पुलिस वाला न सुन ले
इसलिए इस पुलिस कथा को अब यहीं विश्राम देते हैं
और प्रस्थान लेते हैं
नमस्कार!


Wednesday, 28 March 2012

राष्ट्र को राष्ट्रभाषा का ताज पहनाओ


मेरे राजनीतिक भाई!
तुमने हमारी राष्ट्रभाषा हिन्दी को कहां धकेल दिया
क्यों नहीं उसको उसका सही स्थान दिया?
स्वाधीनता के संघर्ष में
गंगा-जमुनी हिन्दी ही बनी थी देश की संपर्क भाषा
पूरे देश ने हिन्दी को अपनाया था
हिन्दी के नेतृत्व ने
वंदेमातरम्!
इंकलाब ज़िदाबाद!
अंग्रेज़ो भारत छोड़ो! का अलख जगाया था
सामूहिक आंदोलन चले थे पूरे देश में
हम मिलकर गरजे-गरियाए थे अंग्रेज़ी सत्ता के खिलाफ
हमारी एकता रंग लाई
गुलामी से मुक्ति मिली
तिरंगा फहराया
लोकतंत्र कायम हुआ देश में
तुम और तुम्हारे साथियों ने राजकाज संभाला
उम्मीद जगी थी कि हिदीमय हो जाएगा देश
किन्तु कुछ नहीं बदला
हमने अनेक बार किए प्रदर्शन
तब तुमने हिन्दी को राजभाषा घोषित किया
किन्तु संविधान में
अंग्रेज़ी को धीरे-धीरे हटाने का नुक्ता जोड़ दिया
राजकाज में नहीं उतारी तुमने हिन्दी
तुम सत्ता के मद में खो गए
भूल गए कि हिन्दी को विज्ञान से है जोड़ना
न्याय की प्रक्रिया में है मोड़ना
रोज़ी-रोटी के साधनों में ढालना।

मेरे राजनीतिक भाई!
कभी तुम अपनों के बीच गर्व से कहा करते थे
हिन्दी भाषा पूर्णतया वैज्ञानिक है
इसमें जो लिखा जाए, वही बोला जाता है
कोई व्यतिक्रम या व्यायाघात नहीं होता गैर हिन्दी भाषी को
इस भाषा को कबीर और तुलसी ने निखारा है
बिहारी और देव ने संवारा है
सूरदास ने वाणी दी है इसके ममत्व को
रसखान ने जाना है इसके महत्व को
मीरा ने बजाई है इसमें नटनागर की बांसुरी
जायसी ने हटाई है धुध आसुरी
महादेवी ने भरे हैं भाव इसमें नरम मोम से
निराला ने मिलाया है इसे व्योम से
भारतेन्दु ने सरजी है इसे नई सर्जना
दिनकर ने दी है इसे हुकार-गर्जना
इसमें पीर पर्वत-सी लिखी दुष्यंत ने
प्रकृति का प्रेम भर दिया इसमें पंत ने
किन्तु तुम्हारी कथनी और करनी में अंतर रहा।

मेरे राजनीतिक भाई!
तुमने नहीं दिया हिन्दी को उसका सम्मान
हिन्दी अपने ही घर में हो गई है मोहताज
आज अंग्रेज़ी में ही हैं रोजगार के मुख्य साधन
अंग्रेज़ी में ही होता है राजकाज
अंग्रेज़ी में हो रहे हैं अदालत के फैसले
बेगानापन लिए भौचक है आमजन
जाग जाओ भाई
राष्ट्र को राष्ट्र की भाषा का ताज  पहनाओ
हिन्दी भाषा को अपनाओ।


Monday, 26 March 2012

मेरे अन्दर का जानवर


मेरे अन्दर के जानवर ने
अनेक बार मुझे नीचा दिखाया है
जब से मैंने होश संभाला है
मेरा इससे युद्ध जारी है
ज्यादातर यही हावी रहा है मुझ पर
मैं हल्का रहा हूं
पर मैंने हिम्मत नहीं हारी है
ज़िदा है मेरा अहसास
कि मैं इंसान हूं।

मेरे अन्दर का जानवर
वहशी है और डरपोक भी
अपनी शैतानियत ये ललचाता और फंसाता रहा है मुझे
हंगामा बरपा है जब भी कभी मुझ पर
यह दुम दबाकर भाग  गया है वहां से
मैं प्रगति की सीढ़ियों के नीचे गिरा हूं
हर बार इसने मुझ पर व्यंग्य किया है कि मैं सिरफिरा हूं
मैंने पकड़ ली है इसकी कमजोरी
यह किताब से डरता है
जब-जब किताब होती है मेरे हाथ में
यह से व्यंग्य करता है
गिर-गिर कर संभालता आया हूं मैं अपने को
उम्मीद है अब नहीं गिरूंगा
जब तक अपने अंन्दर के जानवर को नहीं मार दूंगा
मैं नहीं मरूंगा
अब मेरे चारों ओर किताबें हैं
मैं किताबों के अध्ययन में डूबा हूं
मेर हाथ में भी है किताब
खत्म होने वाला है अब मेरे दुश्मन का हिसाब
मेरा अन्दर का जानवर अब लुंज-पुंज हो गया है
धीमी-धीमी सांसें चल रही हैं उसकी।

Saturday, 24 March 2012

आज़ादी की हीरक जयंती का जश्न


साठ वर्ष के हो गए हैं आज़ादी और लोकतंत्र!

आज़ादी के पांव में पुर गए हैं बेड़ियों के घाव
हसरतें रह गई हैं अधूरी
उसे मलाल है
क्यों नहीं बरजा उसने तब पहरुओं को
जो सत्ता के दरवाज़े
दुकानों की तरह सजा कर बैठ गए
और धीरे-धीरे सत्ता को बाज़ार में बदल गए
फिर उन्हें अपने ही उत्तराधिकारियों को सौंप गए
देख रही है आज़ादी
सत्ता हो गई है शापिंग माल के मानिंद।

उधर लोकतंत्र मना रहा है आज़ादी की हीरक जयंती
शाही आनबान में गढ़ लिए हैं उसने
सत्ता के कुछ नए मंत्र
आज़ादी का आंदोलन और उसकी कुर्बानियां
लोकतंत्र के लिए हैं सिर्फ किस्से कहानियां
उसे तो होते ही मिला सत्ता का गुलदस्ता
उसका कहना है
कम साधनों में किया उसने संघर्ष
पाया उत्कर्ष
आज उसकी झोली में है उजास ही उजास
यह उसकी अपनी कमाई है
मानसिक व्यायाम से ही मिले हैं उसे सत्ता के नए आयाम
देश की विकास दर छू रही है आकाश
अंधेरा मत देखिए--देखिए सिर्फ प्रकाश
खुशी के माहौल में मुफलिसी का गीत मत गाइए
जश्न का मौसम है जश्न मनाइए।

Friday, 23 March 2012

आरक्षण का दैत्य


समाज कल्याण के नाम पर राजनीति ने
आरक्षण नहीं, शिगूफे बांटे हैं
यह आरक्षण ए वर्ग/वह आरक्षण बी वर्ग
इधर अल्पसंख्यकों का आरक्षण/उधर मुफलिसों का आरक्षण
आरक्षण की मरीचिका से मोहित
अब तो फले-फूले समाज से भी
उठने लगी है आरक्षण की मांग
जाट मांगते हैं आरक्षण
मुस्लिम मांगते हैं आरक्षण
यादव मांगते हैं आरक्षण
राजपूत मांगते हैं आरक्षण
पंडित मांगते हैं आरक्षण
बिखर रहा है समाज
झिंझोड़ रहा है यह यक्ष प्रश्न
क्या होगा इस आरक्षण के दैत्य का?
राजनीति खत्म करेगी इस दैत्य को
या भस्मासुर की तरह खुद ही भस्म हो जाएगा यह!