Wednesday, 29 February 2012

यात्री


ध्यान से देखो गुबरैले के अथक परिश्रम को
समझो चींटी की लगन को
महसूसो प्रवासी पक्षियों के हौसले को
तोलो मधुमक्खियों की तन्मयता को
और मापो बया की निपुणता को।

पढ़ो मन की डायरी को
सोचो कि कहां गई तुम्हारी शिशु वाली निश्छलता?
विचारो कि रिश्तों में गुणा-भाग क्यों आया?
निरखो कि तुम जहां से चले थे, वहां भी मौजूद क्यों नहीं हो?
जानो कि मां की आंखों में आजन्म क्यों रहती है ममता?

छांव सदा ही नहीं रहती
जुड़ी है वह धूप से
यात्री के पांव के नीचे बदलती रहती है जमीन
रोपे गए पौधे महकते और फलते हैं बाद में भी।

रह जाएगी सिर्फ राख में दबी आग


फिर जरूरत ही नहीं पड़ेगी किसी को किसी से युद्ध करने की
धीरे-धीरे खत्म हो जाएगा जिन्दगी जीने का विचार
आग ही आग रह जाएगी पृथ्वी के आंचल में
आग में दहकती आग
राख में चहकती आग
समुद्र में उबलती आग
हवाओं में मचलती आग
आकाश से बरसती आग
ऊपर-नीचे चारों ओर होगी आग ही आग
सबकुछ जल जाएगा आग में
सबकुछ मिट जाएगा आग से
न राष्ट्राध्यक्ष बचेगा कोई
न नागरिक
न होगी जिन्दगी
न होगी बन्दगी।

खूब-खूब रोएगा आकाश सूनी पृथ्वी को देखकर
फट-फट जाएगी पृथ्वी की छाती
डबडबाई हवा भटकेगी हरियाली के लिए
जल-जीव विहीन समुद्र हहराएगा बतरस के लिए
हर ओर हागा श्मशान-सा सन्नाटा
जिन्दगी कहीं नहीं होगी।

दौड़ रही हैं इसी भयावहता की ओर
दुनिया की तानाशाह और जिद्दी सरकारें
दांव पर लगी हैं असंख्यों-असंख्य जिन्दगियां और उनके गीत
जल्दी ही किसी बांसुरी से नहीं निकली कोई मधुर धुन
दृष्टि और शब्दों में नहीं घुली मिठास
आग और धुएं की यदि नहीं रुकी अंधी दौड़
तो!
आतिशबाजी में जल जाएंगे सबके सब आतिशबाज
उनके सपनों के साथ जल जाएगा उनका गुरूर भी
रह जाएगी सिर्फ राख में दबी आग।

Tuesday, 28 February 2012

उत्सवी हम


उत्सवों में हम वह नहीं होते
जो होते हैं
तब हम कुछ और होने के लिए
कुछ और होते हैं।

हम दिखने को द्विगुणित
फैलाते हैं अपना गणित
हरने को जीवन की तीक्ष्णता/रिक्तता
भरने को सपनों में रंग
तलाशते हैं हम
हर काम-काज में उत्सव के क्षण
हम उत्सवी
उत्सवों में ही छले जाते हैं
और उत्सवों में ही किसी को छलते हैं।

Monday, 27 February 2012

कहीं कुछ जल रहा है!


जनाब!
हवा की गंध कहती है
कहीं कुछ जल रहा है!
पल-पल बदलते आपके तेवर बताते हैं
आपको कुछ खल रहा है।

अंतरिक्ष ने परोस दिए हैं शिगूफे
हांफने लगा है शेयर बाजार
तोल रहे हैं अपने डैने
अट्टालिकाओं में धंसे गिद्ध
जाहिर है कुछ अजूबा चल रहा है
मुझे तो लगता है
कोई नया मरघट ढल रहा है।

जनाब!
आंदोलनरत है सड़कों पर
गुस्साए लोगों की भीड़
चिल्ला रही है--शेम! शेम! शेम!
बाज आओ अंकल सेम!
ये साम्राज्यवादी दादागिरी नहीं चलेगी!
कुछ तो बताइए जनाब!
यह क्या चल रहा है?
आपके राजधर्म में क्या उबल रहा है?
कुछ समझ नहीं आता
अपना देश स्वतंत्र है या ओढ़े हुए है स्वतंत्रता का चेहरा!
क्यों बना हुआ है यह साम्राज्यवादियों का मोहरा
कौन किस पर दांव चल रहा है?

जनाब!
मैं तो दूसरों को डराने के लिए
आपका ही खड़ा किया हुआ, बेजान बिजूका हूं
मुझसे न डरें, सच बताएं--
आपके मन में क्या मचल रहा है?

Saturday, 25 February 2012

उच्च शिक्षा के बागान


जिसे धारण कर आदमी हो जाता है संधानी
कहलाता है लायक
बन जाता है कमाऊ
पहुंच  जाता है सितारा श्रेणी में
वह उच्च शिक्षा
‘अलफांसो’ आम हो गई है
जो आम तो है पर ‘खास’ के लिए।

देश के स्कूल-कालेज
दशहरी लंगड़ा, टपका, चौंसा आम आदि दर्जे के हैं
जहां से खरीदी गई शिक्षा की सनद
सफेदपोश चूहों में बदल देती है लोगों को
जो या तो दफ्तरों की फाइल कुतरते हैं
 या सामाजिकता के वस्त्र
आम आदमी तो
टुकुर-टुकुर देखता है इन शिक्षा बागानों को
वह तो जब-तब
आंधी-झरे अधपके आम आमों की बारहखड़ी ही पढ़ पाता है
और सड़कछाप साक्षर बनकर रह जाता है।

इन शिक्षा बागानों की व्यवस्था
हर युग में रही है द्रोणाचार्यों के हाथों में
लक्ष्मीपुत्रों की ही रही है उन बागानों तक पहुंच
जब भी किसी एकलव्य ने
लुक-छिपकर चखा है विशेष आमों का स्वाद
उसे अपना अंगूठा काटकर देना पड़ा है
अपना अस्तित्व खोना पड़ा है।

यूं तो वर्तमान में
अनेक मिथक टूट रहे हैं आरक्षण व्यवस्था से
कुछ पिछड़ों को भी मिल रहे हैं
खास आम चखने के अवसर
किन्तु विडंबना यह है
खास आम चख पाने वाले वे पिछड़े भी
द्रोणाचार्यों में बदल रहे हैं या लक्ष्मी पुत्रों में
आम आदमी बस आंधी का ही करता है इंतजार।

आपके पास है इसका कोई तोड़
या यूं ही चलता रहेगा यह गंठजोड़?

Wednesday, 22 February 2012

मां


मां! हो न पाया मैं उऋण
और तुमने छोड़ दी यह मानवी दुनिया।

प्रस्थान की वेला में तुमसे मैं निमिषभर दूर था
सूचना मिलते ही क्षण में आ गया था पास
किन्तु तुमने नयनभर मुझको नहीं देखा
मूर्च्छा में लीन
कर रही थीं पार तुम दर्द का दरिया
सुबक रहा था मैं
पलंग के किनारे खड़ा अस्पताल में
लुटे-पिटे यात्री-सा
कंपकंपाई जब क्षणिक पलकें तुम्हारी
लगा था सुन लिया है लाड़ले का रुदन तुमने
किन्तु फिर तुम हो गई थीं यथास्थिर।

मां!
तुम तपस्यालीन-सी लेटीं
याद शायद कर रही थीं इष्ट को
या मनपटल पर चल रहे चलचित्र में
देख रही थीं तुम किसी अनिष्ट को
तुम्हारे कंपकंपाते होंठ
चिंतित कर रहे थे हम सभी को
लग रहा था तुम कोई राज गहरा
बतला रही हो अपनी बहू को
थी तुम्हारे पास अर्द्धांगिनी मेरी
और हतप्रभ-से खड़े थे सभी बच्चे
फट गई थीं तनाव से तुम्हारे मस्तिष्क की शिरा
मुझे लगा था--मैं अभिमन्यु हूं चक्रव्यूह से घिरा।

चेतना में पुन: लाने को तुम्हें
लगे थे कई गुनिया।
मां! हो न पाया मैं उऋण
और तुमने छोड़ दी यह मानवी दुनिया।

मां! तुम दुखी थीं मेरी गृहस्थी के लिए
सोचती थीं कैसे नैया पार होगी इस अभागे की
मैं जमाने के संग नहीं था दौड़ता
छलछंद की दुनिया में बिलकुल मूढ़ था
बेबाकी जब मुझको रास नहीं आई
तो मुफलिसी बन गई मेरी शैदाई
मेरी डगमगारती गृहस्थी की नाव देख
मां भीग जाती थीं तुम्हारी आंखों की कोर
चिंतित रहती थीं तुम
कब होगी ‘राजे’ की काली रात की उजली भोर।

मां! यह तुम्हारी दुआओं की ही असर है
झंझावातों से निकल आई है मेरी नैया
आ लगा हूं किनारे पर
तुमने सहेजकर रखा था जो जमीन का टुकड़ा
उस पर ही बना लिया है मैंने एक छोटा-सा आशियाना
बेटियों के कर दिए हैं हाथ पीले
बेटे भी हो गए हैं नौजवान सजीले
सब चैन अमन है
मां! तुझको शत बार नमन है।

नहीं पता जीवन की कपास का कौन है धुनिया
और इस झीनी चादर का कौन है बुनिया।
मां! हो न पाया मैं उऋण
और तुमने छोड़ दी यह मानवी दुनिया।

Tuesday, 21 February 2012

तारक हथियार


शिष्य ने कहा--गुरुदेव!
मुझे धातु से बने मारक हथियार नहीं,
धतुहीन तारक हथियार चाहिए
जो जीवन किसी का न लें
बल्कि जीवनदान दें
जो मुर्दे में जान भले न डाल पाएं
किन्तु घायल के लिए मरहम बन जाएं।

गुरु ने कहा--वत्स!
मृदुलता, विनम्रता, सहृदयता,
उदारता, सहनशीलता, क्षमा, त्याग
और मानवता के लिए अनुराग
ये गुण हर मानव में विद्यमान हैं
तुम अपने अंतरमन के गुण-अवगुणों के ढेर से
छांट-छांटकर जिस दिन इन्हें धारण कर लोगे
तारक अस्त्र से सुसज्जित हो जाओगे
सज्जन बन जाओगे।